दश्त में यार को पुकारा जाए
क़ैस साहब का रूप धारा जाए
मुझ को डर है कि पिंजरा खुलने पर
ये परिंदा कहीं न मारा जाए
दिल उसे याद कर सदा मत दे
कौन आता है जब पुकारा जाए
दिल की तस्वीर अब मुकम्मल हो
उन की जानिब से तीर मारा जाए
— Vikram Sharma
क़ैस साहब का रूप धारा जाए
मुझ को डर है कि पिंजरा खुलने पर
ये परिंदा कहीं न मारा जाए
दिल उसे याद कर सदा मत दे
कौन आता है जब पुकारा जाए
दिल की तस्वीर अब मुकम्मल हो
उन की जानिब से तीर मारा जाए
Other ghazal from the same pen
Shers of terrorism.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling