अब किसे याद किस धुन में गुज़रा था पिछला ज़माना मेरा

उड़ने वाली सियाही से लिक्खा गया था फ़साना मेरा

तुम नहीं जानते यक-तरफ़ा मुहब्बत की महरूमियाँ
तुम ने देखा नहीं अपनी नज़रों से ख़ुद को छुपाना मेरा

फिर तुम्हारे बराबर खड़ा शख़्स कुछ इस तरह से हँसा
जैसे तुम ने बताया हो उस को है ये भी दीवाना मेरा

अब बहुत तेज़ थी गूँज शहनाइयों की वो सुनता भी क्या
इक ग़लत फ़ैसला था उसे उस घड़ी आज़माना मेरा

बस तुझे भूल जाने का डर था जो ये सब कराता रहा
वरना क्या था तेरे शहर तक जा के बस लौट आना मेरा

— Shariq Kaifi

More by Shariq Kaifi

Other ghazal from the same pen

See all from Shariq Kaifi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling