उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं
सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं
इक बीमार वसीयत करने वाला है
रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं
अभी न जाने कितना हँसना रोना है
अभी तो हम से पहले वाले बैठे हैं
साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है
घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं
अंदर डोरी टूट रही है साँसों की
बाहर बीमा करने वाले बैठे हैं
— Shakeel Jamali















