बोलता है तो पता लगता है
ज़ख़्म उस का भी हरा लगता है
रास आ जाती है तन्हाई भी
एक दो रोज़ बुरा लगता है
कितनी ज़ालिम है मोहज्जब दुनिया
घर से निकलो तो पता लगता है
आज भी वो नहीं आने वाला
आज का दिन भी गया लगता है
बोझ सीने पे बहुत है लेकिन
मुस्कुरा देने में क्या लगता है
मूड अच्छा हो तो सब अच्छा है
वर्ना हँसना भी बुरा लगता है
— Shakeel Jamali















