एक क़िस्सा था मर गया साहेब
आज का दिन गुज़र गया साहेब
दिल किसी ताख पर रखा होगा
रखने वाला किधर गया साहेब
एक मुद्दत पे आँख झपकी थी
ख़्वाब आँखों से डर गया साहेब
— Ritesh Rajwada
आज का दिन गुज़र गया साहेब
दिल किसी ताख पर रखा होगा
रखने वाला किधर गया साहेब
एक मुद्दत पे आँख झपकी थी
ख़्वाब आँखों से डर गया साहेब
Other ghazal from the same pen
Shers of fantasy.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling