काम अच्छा तो कर गया हूँ मैं

क्यूँ नज़र से उतर गया हूँ मैं

उस को अहसास हो मेरे दुख का
कर के वा'दा मुकर गया हूँ मैं

कोई मुझ को समेट ले आ कर
ज़र्रा-ज़र्रा बिखर गया हूँ मैं

रोज़े महशर हो क्या ख़ुदा जाने
जो न करना था कर गया हूँ मैं

चढ़ के सर बोलते हैं तिनके भी
जब से यारों सुधर गया हूँ मैं

— Raza sahil

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