ये मुझे क्या हुआ क्या से क्या बन गया

वक़्त के साथ पत्थर हवा बन गया

कल शब-ए-हिज्र का मैं मुसाफ़िर हुआ
रात मेरा सफ़र इन्तेहा बन गया

जो ग़म-ए-आशिक़ी का है मारा यहा
मय का कतरा भी उस की दवा बन गया

— Nakul kumar

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