घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा
जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा
रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है
जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
न जाने क्यूँ गले से लगने की हिम्मत नहीं होती
न जाने क्यूँ पिता के सामने बेटे नहीं खुलते
इस तरह रोते हैं हम याद तुझे करते हुए
जैसे तू होता तो सीने से लगा लेता हमें
बिछड़ते वक़्त भी हिम्मत नहीं जुटा पाया
कभी भी उस को गले से नहीं लगा पाया
किसी को चाहते रहने की सज़ा पाई है
मैं चार साल में लड़की नहीं पटा पाया
हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले
कितने प्यारे हैं मुझे छोड़ के जाने वाले
ज़िंदगी भर की मोहब्बत का सिला ले डूबे
कैसे नादाँ थे तिरे जान से जाने वाले
गले मुझ को लगा लो ऐ मेरे दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ मेरे यार होली में
गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जान-ए-मन त्यौहार होली में
गर कोई मुझसे आकर कहता, यार उदासी है
मैं उसको गले लगाकर कहता, यार उदासी है
होता दरवेश अगर मैं तो फिर सारी दो-पहरी
गलियों में सदा लगाकर कहता, यार उदासी है
उसने गले से हमको लगाया तो रो पड़े
अपना बना के हाथ छुड़ाया तो रो पड़े
मैंने ग़मों से कह तो दिया रहना उम्र भर
वादा ग़मों ने अपना निभाया तो रो पड़े