सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'
क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया
ये सोचके तो दूसरी कोई मिट्टी को छु'आ नही
के बाद मरने के हिन्दुस्तां में दफनाया जाऊंगा
बहुत मुश्किल है कोई यूँ वतन की जान हो जाए
तुम्हें फैला दिया जाए तो हिन्दुस्तान हो जाए
यूँ तो इस संसार में हैं और भी कितने जहाँ
हाँ मगर सबसे अलग प्यारा मिरा हिंदोस्ताँ
कल कल बहती भारत की सब नदियाँ याद करेंगी
ओ जन जन के नायक तुझको सदियाँ याद करेंगी
ऐसा नहीं बस आज तुझे प्यार करेंगे
ताउम्र यही काम लगातार करेंगे
सरकार करेगी नहीं इस देश का उद्धार
उद्धार करेंगे तो कलाकार करेंगे
सभी हैरत करेंगे जब नई पहचान लिख देंगे
फ़लक पर भी हुनर से अपने हिंदुस्तान लिख देंगे
चलो ऐ हिंद के सैनिक कि लहराएँ तिरंगा हम
जिसे दुनिया नमन करती है उस पर्वत की चोटी पर
इस वतन में छोटी सी बुलबुल के हूँ मानिंद मैं
मेरा मज़हब कुछ भी हो पर हूँ तो सारा हिंद मैं
तुम्हारे बाद से दुनिया मुझे शमशान लगती है
तुम्हारे बाद हर महफ़िल मुझे वीरान लगती है
क़बा ऐसी तो पहनाकर तुझे पहचान लूँ जिसमें
मुझे ऐसी क़बा में तू कोई शैतान लगती है
मरुँ तो इक तिलक इसका जबीं पर भी लगा देना
मुझे इस हिन्द की मिट्टी मिरा भगवान लगती है
तुझे तो आस्ताँ पर दिल ने पहली बार देखा है
कहाँ से आई है तू मौत का ऐलान लगती है
अहम जितनी सुहागन के लिए माथे की बिन्दी है
ज़रूरी उतनी हिन्दुस्तान के ख़ातिर ही हिन्दी है
कुछ लोगों की ख़ातिर मिरी पहचान बदली है मगर
अब भी मोहब्बत वाले हिंदुस्तान कहते हैं मुझे