@adarshgangwar817128
Adarsh Gangwar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adarsh Gangwar's shayari and don't forget to save your favorite ones.
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दिल ख़ुश-गवार भी है तिरा बे-क़रार भी
कुछ कुछ तो लग रहा है हमें उस्तुवार भी
हरदम उन्हीं के रहते हो घर में घुसे हुए
ऊपर से बन रहे हो बड़े नाक-दार भी
करता हूँ दो शिकार मैं तो एक तीर से
फ़न गीतकार भी है मिरा हुस्न-कार भी
तुमने नहीं कहा था जहाँ छोड़ दे अभी
ऊपर से कर रहे हो मिरा इंतिज़ार भी
तुम लोग कह रहे हो भला आदमी उसे
मुझको नज़र से लग रहा है 'ऐब-दार भी
मुझ पर ही मेरी जान का इल्ज़ाम धर दिया
ऊपर से बोलते हो मुझे ग़म-गुसार भी
हरदम नमक लगाना ग़रीबों के ज़ख़्म पर
ये तेरा काम-काज है और रोज़गार भी
मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे
आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे
एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ
कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे
कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा
बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे
अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है
ज़िंदगी तू ही बता किसके हवाले होंगे
हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने
फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे
अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची
चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे
शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है
तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे
छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम
फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे
ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम देख लो
मिरी ज़िंदगी के भी ग़म देख लो
क़यामत से बढ़कर रहे हैं सभी
कमर के न मानो तो ख़म देख लो
मोहब्बत तो करने चले हो मगर
मोहब्बत में क्या-क्या हैं ग़म देख लो
ये ख़ंजर चलाने से पहले सुनो
मिरा हाल तो कम से कम देख लो
अरे अब के ज़ाहिद भी पीने लगे
न मानो तो दैर-ओ-हरम देख लो
ख़ाक बस्तियों में घर रेत के बनाओगे
रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे
सोचते तो हैं हम भी छत से कूद जाएँ अब
फिर ख़याल आता है तुम कहाँ पे जाओगे
जो हमारे हो कर भी हर किसी को देखोगे
बे-वफ़ा की गिनती में यार आ ही जाओगे
बे-नक़ाब होकर के हम निकल तो आएँगे
हो गया कहीं कुछ भी हमपे टिन-टिनाओगे
शब के आठ बजते ही तुम कहाँ पे जाते हो
कोई पूछ बैठा फिर बोलो क्या बताओगे
जब रक़ीब बनकर ही कुछ नहीं हुआ तुमसे
तुम हबीब बनकर क्या बस्तियाँ जलाओगे
जब नज़र झुकाओगे बात बन ही जाएगी
प्यार से जो बोलेंगे तुम भी मान जाओगे
इश्क़ का मुहब्बत का जब बुख़ार आएगा
वक़्त पर दवा लेना ख़ुद ही भूल जाओगे
जब कभी भी तन्हाई नोच करके खाएगी
मेरा नाम लिख कर तुम हाथ पर मिटाओगे
दास्ताँ मोहब्बत की एक बार सुन लोगे
मेरा नाम गीतों में तुम भी गुन-गुनाओगे
हुस्न वालों में सभी को शंग होना चाहिए
और इसके साथ ही नव-रंग होना चाहिए
अंजुमन में आएँगे तो दाद भी देंगे मगर
हर सुख़न-वर शर्त है ख़ुद-रंग होना चाहिए
मैं ज़माने में अगर मंसूब था तो तुमसे था
क़ब्र में भी तुमको मेरे संग होना चाहिए
तीस दिन में एक दिन ही दिल पे दस्तक देते हो
इश्क़ करने का कोई तो ढंग होना चाहिए
मुझसे ही मंसूब है इस मुल्क की मिट्टी तो फिर
इस तिरंगे में भी मेरा अंग होना चाहिए
ख़्वाबों में सही रोज़ सताने के लिए आ
आ फिर से मिरे दिल को चुराने के लिए आ
हर कोई समझता है मुझे काँच का मरहम
कुछ और हूँ मैं इनको बताने के लिए आ
हर बार तिरे बस में कहाँ मुझको उठाना
इस बार निगाहों से गिराने के लिए आ
वो रात वही दिन वही तन्हाई का आलम
आँखों में वही प्यास जगाने के लिए आ
साँसों के चराग़ाँ तिरी ज़ुल्फ़ों ने बुझाए
अब तू ही जनाज़े को उठाने के लिए आ
इक तेरे सिवा था ही मिरा कौन जहाँ में
सो क़ब्र की भी रस्म निभाने के लिए आ
जिन दस्त-ए-मुबारक में मिरी जान बसी थी
मस्जिद में वही हाथ उठाने के लिए आ
कुछ लोग ज़माने में हम नाम निकल आए
जो ख़ास सभी से थे वो 'आम निकल आए
है सबसे जुदा तेरा अंदाज़ तबस्सुम का
जो एक हँसी में दो गुलफ़ाम निकल आए
जो सबको सिखाते थे इकराम मुहब्बत का
उन पर ही मुहब्बत के इल्ज़ाम निकल आए
जो सबको बताते थे मैं अजनबी हूँ कोई
वो नाम से मेरे ही बदनाम निकल आए
तू अहल-ए-ज़मीं से सुन हर बात बना के रख
कुछ भी न पता किससे क्या काम निकल आए
तुम्हारे बाद से दुनिया मुझे शमशान लगती है
तुम्हारे बाद हर महफ़िल मुझे वीरान लगती है
क़बा ऐसी तो पहनाकर तुझे पहचान लूँ जिसमें
मुझे ऐसी क़बा में तू कोई शैतान लगती है
मरुँ तो इक तिलक इसका जबीं पर भी लगा देना
मुझे इस हिन्द की मिट्टी मिरा भगवान लगती है
तुझे तो आस्ताँ पर दिल ने पहली बार देखा है
कहाँ से आई है तू मौत का ऐलान लगती है