वो देखने हमें टुक बीमारी में न आया

सौ बार आँखें खोलीं बालीं से सर उठाया

गुलशन के ताएरों ने क्या बे-मुरव्वती की
यक बर्ग-ए-गुल क़फ़स में हम तक न कोई लाया

बे-हेच उस का ग़ुस्सा यारो बला-ए-जाँ है
हरगिज़ मना न हम से बहतेरा ही मनाया

क़द्द-ए-बुलंद अगरचे बे-लुत्फ़ भी नहीं है
सर्व-ए-चमन में लेकिन अंदाज़ा वो न पाया

नक़्शा अजब है उस का नक़्क़ाश ने अज़ल के
मतबू ऐसा चेहरा कोई न फिर बनाया

शब को नशे में बाहम थी गुफ़्तुगू-ए-दरहम
उस मस्त ने झँकाया या'नी बहुत झुकाया

दिल-बस्तगी में खुलना उस का न उस से देखा
बख़्त-ए-निगूँ को हम ने सौ बार आज़माया

आशिक़ जहाँ हुआ है बे-ढंगियाँ ही की हैं
इस मीर-ए-बे-ख़िरद ने कब ढब से दिल लगाया

— Meer Taqi Meer

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Gulshan Shayari

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