तेरे इश्क़ में आगे सौदा हुआ था
पर इतना भी ज़ालिम न रुसवा हुआ था
ख़िज़ाँ इल्तेफ़ात उस प करती बजा थी
ये ग़ुचा चमन में अभी वा हुआ था
कहाँ था तू इस तौर आने से मेरे
गली में तेरी कल तमाशा हुआ था
गई होती सर आबलूँ के हुई ख़ैर
बड़ा क़ज़िया ख़ारों से बरपा हुआ था
गिरेबाँ से तब हाथ उठाया था मैं ने
मेरी ओर दामान-ए-सहरा हुआ था
ज़ोहे तालेअ ऐ मीर उन ने ये पूछा
कहाँ था तू अब तक तुझे क्या हुआ था
— Meer Taqi Meer















