सैर कर अंदलीब का अहवाल

हैं परेशाँ चमन में कुछ पर-ओ-बाल

तब-ए-ग़म तो गई तबीब वले
फिर न आया कभू मिज़ाज-ए-बहाल

सब्ज़ा-नौ-रस्ता रहगुज़ार का हूँ
सर उठाया कि हो गया पामाल

क्यूँ न देखूँ चमन को हसरत से
आशियाँ था मिरा भी याँ पर-साल

सर्द-मेहरी की बस-कि गुल-रू ने
ओढ़ी अब्र-ए-बहार ने भी शाल

हिज्र की शब को याँ तईं तड़पा
कि हुआ सुब्ह होते मेरा विसाल

हम तो सह गुज़रे कज-रवी तेरी
न निभे पर ऐ फ़लक ये चाल

दीदा-ए-तर पे शब रखा था 'मीर'
लुक्का-ए-अब्र है मिरा रूमाल

— Meer Taqi Meer

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Dushmani Shayari

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