इधर से अब्र उठ कर जो गया है

हमारी ख़ाक पर भी रो गया है

मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानेहा सा हो गया है

मुक़ामिर-ख़ाना-ए-आफ़ाक़ वो है
कि जो आया है याँ कुछ खो गया है

कुछ आओ ज़ुल्फ़ के कूचे में दरपेश
मिज़ाज अपना उधर अब तो गया है

सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है

— Meer Taqi Meer

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Zulf Shayari

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