होता है याँ जहाँ में हर रोज़-ओ-शब तमाशा
देखा जो ख़ूब तो है दुनिया अजब तमाशा
हर चंद शोर-ए-महशर अब भी है दर पे लेकिन
निकलेगा यार घर से होवेगा जब तमाशा
भड़के है आतिश-ए-ग़म मंज़ूर है जो तुझ को
जलने का आशिक़ों के आ देख अब तमाशा
तालेअ' जो मीर ख़्वारी महबूब को ख़ुश आई
पर ग़म ये है मुख़ालिफ़ देखेंगे सब तमाशा
— Meer Taqi Meer















