दिल इश्क़ का हमेशा हरीफ़-ए-नबर्द था

अब जिस जगह कि दाग़ है याँ आगे दर्द था

इक गर्द-ए-राह था पय-ए-महमिल तमाम राह
किस का ग़ुबार था कि ये दुम्बाला गर्द था

दिल की शिकस्तगी ने डराए रखा हमें
वाँ चीं जबीं पर आई कि याँ रंग ज़र्द था

मानिंद-ए-हर्फ़ सफ़्हा-ए-हस्ती से उठ गया
दिल भी मिरा जरीदा-ए-आलम में फ़र्द था

था पुश्ता रेग-ए-बाद ये इक वक़्त कारवाँ
ये गर्द-बाद कोई बयाबाँ नवर्द था

गुज़री मुदाम उस की जवानान-ए-मस्त में
पीर-ए-मुग़ाँ भी तुर्फ़ा कोई पीर मर्द था

आशिक़ हैं हम तो 'मीर' के भी ज़ब्त-ए-इश्क़ के
दिल जल गया था और नफ़स लब पे सर्द था

— Meer Taqi Meer

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