मैं ने तो बस मज़ाक़ में पूछा ख़राब है?

वो पीर हाथ देख के बोला ख़राब है

हर दिन उसे दिखाया कि कितने शरीफ़ हैं
हर रात उस के बारे में सोचा ख़राब है

ये इश्क़ हो चुका है तुरुप-चाल ताश की
आगे ग़ुलाम के मिरा इक्का ख़राब है

आज़ाद लड़कियों से भली क़ैद औरतें
मतलब कि झील ठीक है दरिया ख़राब है

हम जिस ख़ुदा की आस में बैठे हैं रात दिन
वो जा चुका है बोल के दुनिया ख़राब है

ज़्यादा किसी की मौत पे रोना नहीं सही
और जन्मदिन पे शोर शराबा ख़राब है

आधा भी उस के जितना मैं रौशन नहीं हुआ
मैं जिस दिए को बोल रहा था ख़राब है

— Kushal Dauneria

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Sach Shayari

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