क्या हो कि मेरी ज़िंदगी से तू निकल सके

जिस से कि मेरे दर्द का पहलू निकल सके

दरकार इस लिए है मुझे दूसरा बदन
उस की दिल-ओ-दिमाग़ से ख़ुशबू निकल सके

सब अपनी अपनी लाशों को मंदिर में ले चलो
शायद ख़ुदा की आँख से आँसू निकल सके

गहरी हुईं जड़ें तो ये शाख़ें हरी हुईं
पावँ जमें तो पेड़ के बाज़ू निकल सके

मैं उस के बा'द सिर्फ़ इन्हीं कोशिशों में हूँ
गर्दन से उस के नाम का टैटू निकल सके

अपनी हथेलियों में ये आँखें निचोड़ लूँ
मुमकिन है तेरे हिज्र से चुल्लू निकल सके

मैं चाहता हूँ रात में सूरज-मुखी खिले
मैं चाहता हूँ दिन में भी जुगनू निकल सके

— Kushal Dauneria

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