इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है

जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है

हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ
उस को क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है

आज शब्दों की सभा में एक ये ही शोर था
सुर्ख़ है क्यूँ सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है

काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा
आज भी जिस ज़ख़्म को हम ने सिया बीमार है

रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को अब
इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है

एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं
हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है

कल ग़ज़ल में प्यार के ही काफ़िये का ज़ोर था
आज लेकिन प्यार का ही काफ़िया बीमार है

— Kunwar Bechain

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