न ख़ुशी दे तो कुछ दिलासा दे

दोस्त जैसे हो मुझ को बहला दे

आगही से मिली है तन्हाई
आ मिरी जान मुझ को धोका दे

अब तो तकमील की भी शर्त नहीं
ज़िंदगी अब तो इक तमन्ना दे

ऐ सफ़र इतना राएगाँ तो न जा
न हो मंज़िल कहीं तो पहुँचा दे

तर्क करना है गर तअ'ल्लुक़ तो
ख़ुद न जा तू किसी से कहला दे

— Javed Akhtar

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