अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें

दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमें तो बात करें

शाम हुई फिर जोश-ए-क़दह ने बज़्म-ए-हरीफ़ाँ रौशन की
घर को आग लगाएँ हम भी रौशन अपनी रात करें

क़त्ल-ए-दिल-ओ-जाँ अपने सर है अपना लहू अपनी गर्दन पे
मोहर-ब-लब बैठे हैं किस का शिकवा किस के साथ करें

हिज्र में शब भर दर्द-ओ-तलब के चाँद सितारे साथ रहे
सुब्ह की वीरानी में यारो कैसे बसर औक़ात करें

— Faiz Ahmad Faiz

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