ज़रा मोहतात होना चाहिए था

बग़ैर अश्कों के रोना चाहिए था

अब उन को याद कर के रो रहे हैं
बिछड़ते वक़्त रोना चाहिए था

मिरी वादा-ख़िलाफ़ी पर वो चुप है
उसे नाराज़ होना चाहिए था

चला आता यक़ीनन ख़्वाब में वो
हमें कल रात सोना चाहिए था

सुई धागा मोहब्बत ने दिया था
तो कुछ सीना पिरोना चाहिए था

हमारा हाल तुम भी पूछते हो
तुम्हें मालूम होना चाहिए था

वफ़ा मजबूर तुम को कर रही थी
तो फिर मजबूर होना चाहिए था

— Fahmi Badayuni

More by Fahmi Badayuni

Other ghazal from the same pen

See all from Fahmi Badayuni →

Aansoo Shayari

Shers of aansoo.

All Aansoo Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling