आग़ाज़ से अंजाम-ए-सफ़र देख रहा हूँ
देखा नहीं जाता है मगर देख रहा हूँ
तैराक लगातार यहाँ डूब रहे हैं
चुप-चाप मैं दरिया का हुनर देख रहा हूँ
इस ख़्वाब की ता'बीर कोई मुझ को बता दे
मंज़िल से भी आगे का सफ़र देख रहा हूँ
उस शख़्स के होंटों पे मिरा ज़िक्र बहुत है
मैं अपनी दु'आओं का असर देख रहा हूँ
जो तुझ को बहुत दूर कभी ले गई मुझ से
मैं कब से वही राह-गुज़र देख रहा हूँ
इक उम्र से क़ाएम है ये रातों की हुकूमत
इक उम्र से मैं ख़्वाब-ए-सहर देख रहा हूँ
— Balmohan Pandey















