तुम्हारी याद के दीपक भी अब जलाना क्या

जुदा हुए हैं तो अहद-ए-वफ़ा निभाना क्या

बसीत होने लगी शहर-ए-जाँ पे तारीकी
खुला हुआ है कहीं पर शराब-ख़ाना क्या

खड़े हुए हो मियाँ गुम्बदों के साए में
सदाएँ दे के यहाँ पर फ़रेब खाना क्या

हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है
जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या

वो चाँद और किसी आसमाँ पे रौशन है
सियाह रात है उस की गली में जाना क्या

— Azhar Iqbal

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