शदीद ज़हनी दबाव को कम किया जाए
ये सोचना है कि अब किस का ग़म किया जाए
हम अपनी वहशते टीलों को सौंप देंगे मगर
तुम्हारा हुस्न भी सहरा में ज़म किया जाए
वो शोख ज़िस्म निगाहों पे खुल नहीं रहा है
ख़ुदाए हुस्ने ज़माना करम किया जाए
— Azbar Safeer
ये सोचना है कि अब किस का ग़म किया जाए
हम अपनी वहशते टीलों को सौंप देंगे मगर
तुम्हारा हुस्न भी सहरा में ज़म किया जाए
वो शोख ज़िस्म निगाहों पे खुल नहीं रहा है
ख़ुदाए हुस्ने ज़माना करम किया जाए
Other ghazal from the same pen
Shers of gham.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling