तुझ को अंदाज़े नहीं राह की दुश्वारी के
हम तो क़ाइल हैं तिरी क़ाफ़िला-सालारी के
बे-वफ़ाई भी अगर की तो बताया उस को
मैं ने आदाब निभाए हैं वफ़ादारी के
ये तिरे साथ में रोने से खुला है मुझ पर
हैं तिरी आँख में सब अश्क अदाकारी के
जश्न मैं ने भी मनाया था शजर कटने का
उस ने वो फ़ाएदे गिनवाए मुझे आरी के
दश्त का दश्त जिन आँखों पे लुटा बैठा था
हम भी पीछे थे उसी आहू-ए-तातारी के
अब मुझे याद नहीं पैरहन-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा
हाँ मगर नक़्श तिरे वस्ल की गुल-कारी के
— Ashu Mishra















