मेरे सुख़न में तभी फ़ल्सफ़ा ज़ियादा है
कि मैं ने लिक्खा बहुत कम पढ़ा ज़ियादा है
उस एक रंग की थी जुस्तुजू ज़माने को
वो एक रंग जो मुझ पे खुला ज़ियादा है
तुम ही बताओ अभी कैसे छोड़ दूँ उस को
अभी वो मुझ में ज़रा मुब्तला ज़ियादा है
ये एक पल की वफ़ा मुद्दतों का रोना है
ज़रा से जुर्म की इतनी सज़ा ज़ियादा है
मैं अपने आप में हूँ ही नहीं सो अब मुझ में
कुछ एक दिन से कोई दूसरा ज़ियादा है
— Ashu Mishra















