लाखों की भीड़ में भी कोई हम-नफ़स न हो

अल्लाह तेरी ख़ल्क़ का मतलब क़फ़स न हो

रंग-ए-जमाल-ए-इश्क़ से कूँची भरी हो पर
तस्वीर खींचने के लिए कैनवस न हो

कहिए कि कैसे दिल लगे ऐसी जगह जहाँ
बातें तो बे-हिसाब हों बातों में रस न हो

मैं इश्क़ कर रहा हूँ मगर सोचता भी हूँ
पिछले बरस जो हो चुका अब के बरस न हो

हैरत है एक उम्र की बारिश के बावजूद
आँखों में कोई शक्ल है जो टस से मस न हो

'मिश्रा' जी ऐसे शख़्स से रहते हैं दूर-दूर
जिस में कि रंग-ए-इश्क़ हो रंग-ए-हवस न हो

— Ashu Mishra

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