बे-नूर ख़यालात की बारात है मुझ में
तुम देख के आना कि बहुत रात है मुझ में
समझाता हूँ लेकिन ये समझती ही नहीं है
दिल जैसी कोई शय बड़ी बद-ज़ात है मुझ में
दम भर रहे हैं अब नए मौसम मेरे अंदर
मायूस हूँ ये आख़िरी बरसात है मुझ में
कुछ वक़्त ने तोड़ा है भरम और कुछ उस ने
मैं तो ये समझता था कोई बात है मुझ में
तुम कहते हो मैं क़ैद से बाहर हूँ तुम्हारी
फिर बेड़ियों का शोर जो दिन-रात है मुझ में
हर शख़्स से मिलने का सबब क्या कहूँ 'आशु' बरसों से टली एक मुलाक़ात है मुझ में
— Ashu Mishra















