ख़्वाब के ही हम सहारे चल रहे हैं
ज़ख़्म को भी गुदगुदाते चल रहे हैं
क्या बताएं अब तुम्हें हम हाल अपना
हिज्र में कैसे दीवाने चल रहे हैं
दरिया की तन्हाई का तो सोचिये
साथ जिस के दो किनारे चल रहे हैं
तुम को क्या लगता है तन्हा चल रहा हूँ
साथ मेरे चाँद तारे चल रहे हैं
— Anand Raj Singh















