नज़र-अंदाज़ हो जाने का ज़हर अपनी नसों में भर रहा है कौन जाने
बहुत सर-सब्ज़ ग़ज़लों नज़्मों वाला अपने अंदर मर रहा है कौन जाने
अकेले शख़्स को अपने करीबी मौसमों में किस तरह के ज़ख़्म आए
वो आख़िर किसलिए मां-बाप की क़ब्रों पे जाते डर रहा है कौन जाने
ये जिस के फ़ैज़ से अपने पराएं झोलियाँ भरते हुए थकते नहीं है
ये चश्मा तेरे आने से बहुत पहले तलक पत्थर रहा है कौन जाने
जो पिछले तीस बरसो से मोहब्बत, शा'इरी और याद से रूठे हुए थे
तेरा शाइ'र वो ही बच्चे वो ही बूढ़े इकट्ठे कर रहा है कौन जाने
— Ali Zaryoun















