लहजे में खनक बात में दम है तो करम है

गर्दन दर-ए-हैदर पे जो ख़म है तो करम है

मत सोच कि इस घर पे करम है तो अलम है
दरअस्ल तेरे घर पे अलम है तो करम है

बिस्तर पे कमर ठीक नहीं लगती तो ख़ुश हो
ख़ुराक भी ऐ यार जो कम है तो करम है

बे-निस्बत-ओ-बे-इश्क़ कहाँ मिलती है इज़्ज़त
मुझ पे मेरे मौला का करम है तो करम है

मुंकिर की जलन ही में तो मोमिन का मज़ा है
गर ता'ना-ओ-तश्नी-ओ-सितम है तो करम है

अब जब के कोई हाल भी क्यूँ पूछे किसी का
इक आँख मेरे वास्ते नम है तो करम है

अब जब के कोई आँख नहीं रुकती किसी पर
जो कोई जहाँ जिस का सनम है तो करम है

मिदहत का मज़ा भी हो तग़ज़्ज़ुल की अदा भी
कुछ ऐसा सुख़न तुझ को बहम है तो करम है

अख़्तर से ग़ज़ल-साज़ों के होते हुए 'ज़रयून'
थोड़ा सा अगर तेरा भरम है तो करम है

— Ali Zaryoun

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Aabroo Shayari

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