न दिल से आह न लब से सदा निकलती है

मगर ये बात बड़ी दूर जा निकलती है

सितम तो ये है कि अहद-ए-सितम के जाते ही
तमाम ख़ल्क़ मेरी हम-नवा निकलती है

विसाल-ओ-हिज्र की हसरत में जू-ए-कम-माया
कभी कभी किसी सहरा में जा निकलती है

मैं क्या करूँ मेरे क़ातिल न चाहने पर भी
तेरे लिए मेरे दिल से दुआ निकलती है

वो ज़िंदगी हो कि दुनिया 'फ़राज़' क्या कीजे
कि जिस से इश्क़ करो बे-वफ़ा निकलती है

— Ahmad Faraz

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