जा-ब-जा तीरगी हर घड़ी तीरगी

अब मेरे चार सू आ बसी तीरगी

चार चीज़ों पे मबनी है कमरा मेरा
चंद यादें धुआँ इक घड़ी तीरगी

तेरे आने से इतना चरागाँ हुआ
वरना मेरे लिए ज़िन्दगी तीरगी

रूप कैसे मैं लूँ धार तेरा बता
मिल है पाई कभी रौशनी तीरगी

रात गहरी में छुप जाता है माह भी
हुस्न छीनेगी तेरा मेरी तीरगी

कोई अल्लाह का बन्दा बताए मुझे
आईने में हूँ मैं या खड़ी तीरगी

हाथ मैं ने मिलाया चराग़ों से जब
देख के ये सितम रो पड़ी तीरगी

इन की निस्बत से ही तो मैं ज़िन्दा रहा
आशिक़ी दिलबरी शा'इरी तीरगी

— Ahmad Abdullah

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