वो जो इक शख़्स वहाँ है वो यहाँ कैसे हो

हिज्र पर वस्ल की हालत का गुमाँ कैसे हो

बे-नुमू ख़्वाब में पैवस्त जड़ें हैं मेरी
एक गमले में कोई नख़्ल जवाँ कैसे हो

तुम तो अल्फ़ाज़ के नश्तर से भी मर जाते थे
अब जो हालात हैं ऐ अहल-ए-ज़बाँ कैसे हो

आँख के पहले किनारे पे खड़ा आख़िरी अश्क
रंज के रहम-ओ-करम पर है रवाँ कैसे हो

भाव-ताव में कमी बेशी नहीं हो सकती
हाँ मगर तुझ से ख़रीदार को नाँ कैसे हो

मिलते रहते हैं मुझे आज भी 'ग़ालिब' के ख़ुतूत
वही अंदाज़-ए-तख़ातुब कि मियाँ कैसे हो

— Afzal Khan

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