नेक़ी के रास्ते कि बदी से सने लगे

जब से दलील-बाज़ लगाने गले लगे

ख़ाली क़लम को जेब पे कल क्या लगा दिया
अनपढ़ गँवार लोगों के सीने तने लगे

कोई ख़ता नहीं थी मिरी जान बूझकर
वो आए और झोपड़े को फूँकने लगे

बरसात तो कहीं भी नहीं दूर दूर तक
फिर क्यूँ तिरे दयार सभी सूखने लगे

घिन आ रही थी शायद उने हाल देख कर
कर के निगाह मेरी तरफ़ थूकने लगे

ऐसा नहीं कि शख़्स कोई जानता नहीं
सब जानते हैं फिर भी मुझे घूरने लगे

— Prashant Kumar

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