कम नहीं होता है उस बीमार का दुख

जिस को होता है किसी के प्यार का दुख

तुम हटाओं उस की हर तस्वीर घर से
रोज़ कहता है हमें दीवार का दुख

अब भला उम्मीद उन से क्या रखें हम
जिन को दिखता ही नहीं दिलदार का दुख

फिर कभी जाता नहीं है दूर हम से
सुन लिया इक बार जिन से यार का दुख

तुम मिरी मज़बूरी शायद ही समझतें
तुम ने देखा ही नहीं घर-बार का दुख

लग रही है ये कहानी सब को अच्छी
पर कोई समझा नहीं क़िरदार का दुख

— Govind kumar

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