कहीं मैं जा के नदी में डुबा दूँ क्या ख़ुद को

या फिर मैं आग की लौ में जला दूँ क्या ख़ुद को

सताओ मत मुझे इतना भी ऐ मिरे अपनों
मैं जंग में कहीं जा के कटा दूँ क्या ख़ुद को

मैं पूछता हूँ ये थक हार के तुम्हें जानाँ
मैं मेरी मौत से सीने लगा दूँ क्या ख़ुद को

करार-ए-दिल न कभी साथ होगा तू मेरे
तो साँस लेने से भी अब थका दूँ क्या ख़ुद को

हाँ चुभता है मुझे महबूब का बुरा लहजा
सो बुझती लौ की तरह मैं बुझा दूँ क्या ख़ुद को

ये ज़िन्दगी तो मुहब्बत ही है मुहब्बत बस
मोहब्बतों से भी अब क्या छुपा दूँ क्या ख़ुद को

उसी ने की है यहाँ बे-वफ़ाई उल्फ़त में
तो उस के नाम पे मैं अब मिटा दूँ क्या ख़ुद को

— Deep kamal panecha

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