अक़्ल ने अच्छे अच्छों को बहकाया था

शुक्र है हम पर कुछ वहशत का साया था

तुम ने अपनी गर्दन ऊँची ही रक्खी
वरना मैं तो माला ले कर आया था

मैं अब तक उस के ही रंग में रंगा हूँ
जिस ने सब से पहले रंग लगाया था

मेरी राय सब से पहले ली जाए
मैं ने सब से पहले धोख़ा खाया था

सब को इल्म है फूल और ख़ुश्बू दोनों में
सब से पहले किस ने हाथ छुड़ाया था

इक लड़की ने फिर मुझ को बहकाया है
इक लड़की ने अच्छे से समझाया था

— Zubair Ali Tabish

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