रसाई का क़रीना आँख में है
ज़हे-क़िस्मत मदीना आँख में है
मैं तेरे शहर की जानिब रवाँ हूँ
सर-ए-दरिया सफ़ीना आँख में है
तिरे दस्त-ए-रसा में बाब-ए-रहमत
शफ़ाअत का ख़ज़ीना आँख में है
न चटख़े देखना ये तिश्नगी से
तलब का आबगीना आँख में है
जिला दे इस को अपनी रौशनी से
दु'आओं का नगीना आँख में है
— Yasmeen Hameed















