क्या हुआ कोई सोचता भी नहीं

और कहने को कुछ हुआ भी नहीं

जैसे गुम हो गई शनाख़्त मिरी
अब कोई मुझ को ढूँढ़ता भी नहीं

जिस से रहने लगे गिले मुझ को
वो अभी मुझ को जानता भी नहीं

ऐसा ख़ामोश भी नहीं लगता
और कुछ मुँह से बोलता भी नहीं

चाहता है जवाब भी सारे
और कुछ मुझ से पूछता भी नहीं

मुस्तरद भी कभी नहीं करता
वो मिरी बात मानता भी नहीं

दाद देता है जीतने पे मुझे
और कभी मुझ से हारता भी नहीं

ख़्वाब तक मेरे छीन लेता है
और कुछ मुझ से माँगता भी नहीं

उस तरफ़ सब चराग़ जलते हैं
जिस तरफ़ कोई रास्ता भी नहीं

रात दिन पर मुहीत है तो रहे
रौशनी कोई चाहता भी नहीं

डूबते आफ़्ताब की जानिब
देर तक कोई देखता भी नहीं

— Yasmeen Hameed

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