इतने आसूदा किनारे नहीं अच्छे लगते

एक ही जैसे नज़ारे नहीं अच्छे लगते

इतनी बे-रब्त कहानी नहीं अच्छी लगती
और वाज़ेह भी इशारे नहीं अच्छे लगते

ज़रा धीमी हो तो ख़ुशबू भी भली लगती है
आँख को रंग भी सारे नहीं अच्छे लगते

पास आ जाएँ तो बे-नूरी मुक़द्दर ठहरे
दूर भी इतने सितारे नहीं अच्छे लगते

अपनी गुमनामी के सहराओं में ख़ुश रहती हूँ
अब मुझे शहर तुम्हारे नहीं अच्छे लगते

— Yasmeen Hameed

More by Yasmeen Hameed

Other ghazal from the same pen

See all from Yasmeen Hameed →

Kismat Shayari

Shers of kismat.

All Kismat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling