ज़मीं बनाई गई आसमाँ बनाया गया
बराए-इश्क़ ये सारा जहाँ बनाया गया
तुम्हारी ना को ही आख़िर में हाँ बनाया गया
यक़ीं के चाक पे रख कर गुमाँ बनाया गया
तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थी
कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया
हमारे साथ कोई दो क़दम भी चल न सका
किसी के वास्ते इक कारवाँ बनाया गया
बदल के देख लो तुम जिस्म चाहे औरों से
वहीं पे ठीक है जिस को जहाँ बनाया गया
किसी को जब भी ज़रूरत पड़ी सियाही की
हमारा जिस्म जला कर धुआँ बनाया गया
बस एक मैं ही था बस्ती में बोलने वाला
तो सब से पहले मुझे बे-ज़बाँ बनाया गया
— Yasir Khan















