मिरी चीख़ों से कमरा भर गया था
कोई कल रात मुझ में मर गया था
बहुत मुश्किल है उस का लौट आना
वो पूरी बात कब सुन कर गया था
मुझे पहचानता भी है कोई अब
मैं बस ये देखने ही घर गया था
ज़माना जिस को दरिया कह रहा है
हमारी आँख से बह कर गया था
कई सदियों से सूखा पड़ रहा है
यहाँ इक शख़्स प्यासा मर गया था
हमारा बोझ था सर पर हमारे
तुम्हारे साथ तो नौकर गया था
ये मत समझा ख़ता किस से हुई थी
बता इल्ज़ाम किस के सर गया था
— Yasir Khan















