ज़माने पर न सही दिल पे इख़्तियार रहे

दिखा वो ज़ोर कि दुनिया में यादगार रहे

कहाँ तलक दिल-ए-ग़मनाक पर्दा-दार रहे
ज़बान-ए-हाल पे जब कुछ न इख़्तियार रहे

निज़ाम-ए-दहर ने क्या क्या न करवटें बदलीं
मगर हम एक ही पहलू से बे-क़रार रहे

हँसी में लग़्ज़िश-ए-मस्ताना उड़ गई वल्लाह
तो बे-गुनाहों से अच्छे गुनाहगार रहे

उभारती है हवस तौबा-ए-रिहाई की
कि दिल के साथ ज़बाँ क्यूँ गुनाहगार रहे

दिखा दूँ चीर के दिल दर्द-ए-दिल कहूँ कब तक
ज़बाँ पे क्यूँ ये तक़ाज़ा-ए-नागवार रहे

तड़प तड़प के उठाऊँगा ज़िंदगी के मज़े
ख़ुदा न-कर्दा मुझे दिल पे इख़्तियार रहे

सज़ा-ए-इश्क़ ब-क़द्र-ए-गुनाह ना-मुम्किन
यही बहुत है कि बरहम मिज़ाज-ए-यार रहे

ज़माना उस के सिवा और क्या वफ़ा करता
चमन उजड़ गया काँटे गले का बार रहे

ख़िज़ाँ के दम से मिटा ख़ूब-ओ-ज़िश्त का झगड़ा
चलो ये ख़्वाब हुआ गल रहे न ख़ार रहे

जवाब दे के न तोड़ो किसी ग़रीब का दिल
बला से कोई सरापा उमीद-वार रहे

मज़ा तो जब है 'यगाना' कि ये दिल-ए-ख़ुदबीं
ख़ुदी के नशे में बेगाना-ए-ख़ुमार रहे

'यगाना' हाल तो देखो ज़माना-साज़ों का
हवा में जैसे बगूला ख़राब-ओ-ख़्वार रहे

— Yagana Changezi

More by Yagana Changezi

Other ghazal from the same pen

See all from Yagana Changezi →

Relationship Shayari Collection

Shers of relationship shayari collection.

All Relationship Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling