क़फ़स को जानते हैं 'यास' आशियाँ अपना

मकान अपना ज़मीन अपनी आसमाँ अपना

हवा-ए-तुंद में ठहरा न आशियाँ अपना
चराग़ जल न सका ज़ेर-ए-आसमाँ अपना

सुना है रंग ज़माना का ए'तिबार नहीं
बदल न जाए यक़ीं से कहीं गुमाँ अपना

बस एक साया-ए-दीवार-ए-यार क्या कम है
उठा ले सर से मिरे साया आसमाँ अपना

मज़े के साथ हों अंदोह-ओ-ग़म तो क्या कहना
यक़ीं न हो तो करे कोई इम्तिहाँ अपना

शरीक-ए-हाल हुआ है जो फ़क्र-ओ-फ़ाक़ा में
गढ़ेगा साथ ही क्या अपने मेहमाँ अपना

अजीब भूल-भुलय्याँ है मंज़िल-ए-हस्ती
भटकता-फिरता है गुम-गश्ता कारवाँ अपना

किधर से आती है यूसुफ़ की बू-ए-मस्ताना
ख़राब फिरता है जंगल में कारवाँ अपना

जरस ने मुज़्दा-ए-मंज़िल सुना के चौंकाया
निकल चला था दबे पाँव कारवाँ अपना

ख़ुदा किसी को भी ये ख़्वाब-ए-बद न दिखलाए
क़फ़स के सामने जलता है आशियाँ अपना

हमारे क़त्ल का वा'दा है ग़ैर के हाथों
अजीब शर्त पे ठहरा है इम्तिहाँ अपना

हमारा रंग-ए-सुख़न 'यास' कोई क्या जाने
सिवाए 'आतिश' हुआ कौन हम-ज़बाँ अपना

— Yagana Changezi

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