पिछले को उठ खड़ा न हो दर्द-ए-जिगर कहीं
पहुँचे न उड़ते उड़ते कहीं से ख़बर कहीं
कैफ़िय्यत-ए-हयात से ख़ाली हुआ है दिल
ओ साक़ी-ए-अज़ल मिरा पैमाना भर कहीं
मर जाएँगे तड़प के असीरान-ए-बद-नसीब
सुन पाएँगे जो मुज़्दा-ए-वहशत-ए-असर कहीं
फड़का किए मुरक़्क़ा-ए-आलम के हुस्न पर
ठहरी कभी न अहल-ए-हवस की नज़र कहीं
आख़िर हिजाब-ओ-शर्म की हद भी है मेहरबाँ
पर्दा उलट न दे मिरी आह-ए-सहर कहीं
दिन वादा-ए-विसाल का नज़दीक आ चुका
फिर देर क्या है 'यास' अरे कम्बख़्त मर कहीं
— Yagana Changezi















