लिपटती है बहुत याद-ए-वतन जब दामन-ए-दिल से
पलट कर इक सलाम-ए-शौक़ कर लेता हूँ मंज़िल से
नज़र आए जब आसार-ए-जुदाई रंग-ए-महफ़िल से
निगाह-ए-'यास' बेगाना हुई यारान-ए-यक-दिल से
उभरने के नहीं बहर-ए-फ़ना में डूबने वाले
दुर-ए-मक़सूद ही ग़म है तो फिर क्या काम साहिल से
तसव्वुर लाला-ओ-गुल का ख़िज़ाँ में भी नहीं मिटता
निगाह-ए-शौक़ वाबस्ता है अब तक नक़्श-ए-बातिल से
नहीं मा'लूम क्या लज़्ज़त उठाई है असीरी में
दिल-ए-वहशी फड़क उठता है आवाज़-ए-सलासिल से
किसी शय में न होगी बादा-ए-इरफ़ाँ की गुंजाइश
लड़ा ले साग़र-ए-जम को भी कोई शीशा-ए-दिल से
तसव्वुर ने दिखाया शाहिद-ए-मक़्सूद का जल्वा
उतर आई है लैला सर-ज़मीन-ए-दिल पे महमिल से
रहेगी चार दीवार-ए-अनासिर दरमियाँ कब तक
उठेगा ज़लज़ला इक दिन इसी बैठे हुए दिल से
कहाँ तक पर्दा-ए-फ़ानूस से सर की बला टलती
अज़ल से लाग थी बाद-ए-फ़ना को शम-ए-महफ़िल से
यहीं से सैर कर लो 'यास' इतनी दूर क्यूँ जाओ
अदम आबाद कर डांडा मिला है कू-ए-क़ातिल से















