किस दिल से तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-दुनिया करे कोई

वो ख़्वाब-ए-दिल-फ़रेब कि देखा करे कोई

क्या सहल है कि तर्क-ए-तमाशा करे कोई
दिल से न हो तो आँख से तौबा करे कोई

ग़ुंचे के दिल में कुछ न था इक आह के सिवा
फिर क्या शगुफ़्तगी की तमन्ना करे कोई

आँखें हों जिस के आँखों ही आँखों में ताड़ ले
दर्द अपना वो नहीं कि टटोला करे कोई

दिल मुज़्तरिब निगाह गिरफ़्तार-ए-शश-जहत
फ़रमाइए किधर का इरादा करे कोई

यादश ब-ख़ैर याद-ए-ख़ुदा आ ही जाती है
अपनी तरफ़ से लाख भुलाया करे कोई

इस की निगाह-ए-शौक़ के क़ुर्बान जाइए
तुझ ऐसे बे-निशाँ को जो पैदा करे कोई

ताअ'त हो या गुनाह पस-ए-पर्दा ख़ूब है
दोनों का जब मज़ा है कि तन्हा करे कोई

बंदे न होंगे जितने ख़ुदा हैं ख़ुदाई में
किस किस ख़ुदा के सामने सज्दा करे कोई

हुस्न-ए-'यगाना' आप ही अपना हिजाब है
हुस्न-ए-हिजाब दूर से देखा करे कोई

— Yagana Changezi

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Ibaadat Shayari

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