दुनिया का चलन तर्क किया भी नहीं जाता

इस जादा-ए-बातिल से फिरा भी नहीं जाता

ज़िंदान-ए-मुसीबत से कोई निकले तो क्यूँकर
रुस्वा सर-ए-बाज़ार हुआ भी नहीं जाता

दिल बाद-ए-फ़ना भी है गिराँ-बार-ए-अमानत
दुनिया से सुबुक-दोश उठा भी नहीं जाता

क्यूँ आने लगे शाहिद-ए-इस्मत सर-ए-बाज़ार
क्या ख़ाक के पर्दे में छुपा भी नहीं जाता

इक मअ'नी-ए-बे-लफ़्ज़ है अंदेशा-ए-फ़र्दा
जैसे ख़त-ए-क़िस्मत कि पढ़ा भी नहीं जाता

— Yagana Changezi

More by Yagana Changezi

Other ghazal from the same pen

See all from Yagana Changezi →

Dil Shayari

Shers of dil.

All Dil Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling